Lesson 4
Trilingual Spiritual Discourse (त्रिभाषीय सत्संग)
Shrimad-Bhagawad-Gita (श्रीमदभगवद्गीता)
Chapter 1 (verses 1 to 19)
अध्याय 1
धृतराष्ट्र उवाच
धर्मक्षेत्रे कुरूक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः।
मामकाः पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत सञ्जय।। 1।।
...
स घोषो धार्तराष्ट्राणां हृदयानि व्यदारयत्।
नभश्च पृथिवीं चैव तुमुलो व्यनुनादयन्।। 19।।
धर्मक्षेत्रे कुरूक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः।
मामकाः पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत सञ्जय।। 1।।
...
स घोषो धार्तराष्ट्राणां हृदयानि व्यदारयत्।
नभश्च पृथिवीं चैव तुमुलो व्यनुनादयन्।। 19।।
Shri Ramanuja Bhashya (श्रीरामानुज भाष्य)
दुर्योधनः स्वयमेव भीमाभिरक्षितं पाण्डवानां बलम् आत्मीयं च भीष्माभिरक्षितं बलम् अवलोक्य आत्मविजये तस्य बलस्य पर्याप्ताम् आत्मीयस्य बलस्य तद्विजये चापर्याप्ताम् आचार्याय निवेद्य अन्तरे विषण्णः अभवत्। तस्य विषादम् अवलोक्य भीष्मः तस्य हर्षं जनयितुं सिंहनादं शङ्खाध्मानं च कृत्वा शङ्खभेरीनिनादैः च विजयाभिशंसिनं घोषं च अकारयत्। ततः तं घोषम् आकर्ण्य सर्वेश्वरेश्वरः पार्थसारथी रथी च पाण्डुतनयः त्रैलोक्यविजयोपकरणभूते महति स्यन्दने स्थितौ त्रैलोक्यं कम्पयन्तौ श्रीमत्पाञ्चजन्य-देवदत्तौ दिव्यौ शङ्खौ प्रदध्मतुः। ततो युधिष्ठिर-वृकोदरादयः च स्वकीयान् शङ्खान् प्रदध्मुः। स घोषो दुर्योधन-प्रमुखानां सर्वेषाम् एव भवत्पुत्राणां हृदयानि बिभेद। अद्य एवं नष्टं कुरूणां बलम् इति धार्तराष्ट्राय सञ्जयः अकथयत्।। 1-19।।
इस पर अपने पुत्रों का विजय चाहने वाले धृतराष्ट्र से संजय ने इस प्रकार से कहा - दुर्योधन स्वयं ही भीम से सुरक्षित पाण्डवों की सेना और भीष्म से सुरक्षित अपनी सेना को देखकर 'पाण्डवों की सेना हमलोगों पर विजय पाने के लिए समर्थ है और अपनी सेना उन पर विजय प्राप्त करने में असमर्थ है', यह बात आचार्य द्रोण से निवेदन करके वह मन में खिन्न हो गया। उसके विषाद को देखकर भीष्म ने दुर्योधन को हर्षित करने के लिए सिंह के समान गर्जना की और शङ्खध्वनि करके शङ्ख-भेरी आदि वाद्यों के द्वारा विजयसूचक शब्द करवाया । फिर उस ध्वनि को सुनकर त्रिलोक को जीतने के साधनरूप महान रथ पर आरूढ़ हुए सर्वेश्वरेश्वर पार्थसारथी श्रीकृष्ण और महारथी पाण्डुपुत्र अर्जुन - इन दोनों ने भी त्रिलोक को कम्पित करते हुए श्रीसम्पन्न पाञ्चजन्य और देवदत्त नामक दिव्य शङ्खों को बजाया। फिर युधिष्ठिर, भीम आदि ने भी अपने अपने अलग अलग शङ्खों को बजाया। वह ध्वनि आपके दुर्योधन आदि सभी पुत्रों के हृदय को विदीर्ण करने लगा। आपके सारे पुत्र यह समझने लगे कि अब कौरवी सेना नष्ट होने ही वाली है।
Sanjay said to Dhritarashtra who had a wish to listen the dialogue of victory of Duryodhana, "After self observation of the army of Pandavas well secured by Bheema and his own army secured by Bheeshma, Duryodhana analysed the efficiency of the army of Pandavas to win over them and the inefficiency of their own army to win over the Pandavas. He became hopeless after conveying this to his Acharya Dronacharya. After observing Duryodhan's hopelessness, Bheeshma roared like a lion and blew conch to create sounds of victory from conches and trumpets to arouse cheer in the heart of Duryodhan. After listening this, the God of all gods-chauffeur of Arjuna-Shri Krishna and son of Pandu-the great warrior Arjuna seated over the great chariot which is the medium of victory over the Triloka, blew the conches named as the powerful Panchajanya and Devadatta thrilling the Triloka. Following this, Yuddhishtthira, Bheema etc also blew their own conches differently. That sound thrilled the heart of Duryodhan and your other sons. They all realized the sudden end of the army of Kaurava.
+918958449929
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