Lesson 7
Shrimad-Bhagawad-Gita (श्रीमदभगवद्गीता)
Trilingual Spiritual Discourse (त्रिभाषीय सत्संग)
Chapter 1 (verses 26 to 47)
अध्याय 1
अध्याय 1
तत्रापश्यत्स्थितान् पार्थः पितृनथ पितामहान् ।
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विसृज्य सशरं चापं शोकसंविग्नमानसः ।।47।।
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विसृज्य सशरं चापं शोकसंविग्नमानसः ।।47।।
तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे अर्जुनविषादयोगो नाम प्रथमो अध्यायः ।।1।।
Shri Ramanuja Bhashya (श्रीरामानुज भाष्य)
Sanskrit
स तु पार्थो महामनाः परमकारुणिको दीर्घवन्धुः परमधार्मिकः सभ्रातृको भवद्भिः अतिघौरैः मारणैः जतुगृहादिभिः असकृद्वञ्चितः अपि परमपुरूषसहायः अपि हनिष्यमाणान् भवदीयान् विलोक्य बन्धुस्नेहेन परमया च कृपया धर्माधर्मभयेन च अतिमात्रस्विन्नसर्वगात्रः सर्वथा अहं न योत्स्यामि इति उक्त्वा बन्धुविश्लेष-जनित-शोकसंविग्न-मानसः सशरं चापं विसृज्य रथोपस्थे उपाविशत् ।।26-47।।
स तु पार्थो महामनाः परमकारुणिको दीर्घवन्धुः परमधार्मिकः सभ्रातृको भवद्भिः अतिघौरैः मारणैः जतुगृहादिभिः असकृद्वञ्चितः अपि परमपुरूषसहायः अपि हनिष्यमाणान् भवदीयान् विलोक्य बन्धुस्नेहेन परमया च कृपया धर्माधर्मभयेन च अतिमात्रस्विन्नसर्वगात्रः सर्वथा अहं न योत्स्यामि इति उक्त्वा बन्धुविश्लेष-जनित-शोकसंविग्न-मानसः सशरं चापं विसृज्य रथोपस्थे उपाविशत् ।।26-47।।
इति श्रीमद्भगवद्रामानुजाचार्य विरचिते श्रीमद्भगववद्गीताभाष्ये प्रथमो अध्यायः ।।1।।
वह महामना परमदयालु, परमबन्धुस्नेही, परमधार्मिक अर्जुन अपने भाईयों के साथ यद्यपि आपलोगों के द्वारा लाक्षागृह आदि अनेक अत्यन्त घोर मृत्युजनक उपायों से बार-बार धोखा खा चुका है और परमपुरुष (भगवान श्रीकृष्ण) की सहायता भी उसे प्राप्त है; फिर भी आपके पुत्रों के मारे जाने का संयोग देखकर बन्धुस्नेह, परमकृपा और धर्म-अधर्म के भय से उसके सारे अंग पसीने से भर गये और – मैं किसी भी अवस्था में युद्ध नहीं करूंगा-, ऐसा कहकर वह बन्धुवियोगजनित शोक से खिन्न मन हो बाणों सहित धनुष को छोडकर रथ पर बैठा गया ।।26-47।।
इस प्रकार श्रीमान् भगवान रामानुजाचार्य द्वारा रचित श्रीमद्भगवद्गीता-भाष्य के हिन्दी भाषानुवाद का पहला अध्याय समाप्त हुआ ।।1।।
Although, Arjuna, who is a great hearted, great sympathetic, great lover of kinsmen and great righteous personality; along with his brothers had been betrayed by You by burning in Shellac house and other dreadful activities repeatedly and had got the assistance of the Supreme Man (Bhagawan Shri Krishna): even then after imagining the killing of Your sons due to love with His kinsmen, great kindness and confused between righteousness and unrighteousness; He felt perspired and declared that He wont be involving in the war at any cost. With an aggrieved psyche from the sorrow of imagination of the massacre, He left his bow along with the arrows and sat over the seat on chariot. ।।26-47।।
Thus, the English translation of first chapter from the Shrimadbhagawada-gita commentary written by Bhagawan Shri Ramanuja Swamiji gets completed.
+918958449929
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